कहाँ ले जा रही गोरक्षा
आज बहुत समय बाद मैंने पापा से फ़ोन पर बात की. एक साल हो चुके घर गए हुए. हाल चाल के साथ मैंने पूछ लिया इस समय घर पर कितनी गायें है. उन्होंने बताया चार. मैं दो या तीन की उम्मीद कर रहा था तो कौतूहल से पूछा नई आई हैं क्या. उन्होने कहा हाँ एक पास के गांव से खरीदी है और दूसरी लावारिस है, खेत में चर रही थी, नुकसान कर रही थी तो बाँध ली है. लावारिस सुनकर मैं चौंक पड़ा. शहरों में तो मैंने लावारिस गायें देखी हैं लेकिन गावों में ना देखा न इससे पहले सुना, उन्हें तो धन समझा जाता है. फिर और जानने की कोशिश की और जो पता चला काफी संवेदनशील है. ग्रामीण अर्थव्यवस्था में गाय भैंसों का महत्व सभी को मालूम है. पशु दुधारू है तो आय का माध्यम है, दुधारू नहीं तो या तो उसके फिर से दुधारू होने का इंतज़ार किया जाता है या उसे अपेक्षाकृत कम मूल्य में बेच कर और पैसे लगाकर दुधारू पशु ले आया जाता है. ये दूसरा वाला रास्ता ज्यादातर वो लोग लेते हैं जो बिना दूध देने वाले पशु को खिला पिला नहीं सकते क्यूंकि उसमे पूंजी लगती है. और ऐसे गोपालक अब सीधे तौर पर पीड़ित हैं. देश में भीड़ संचालित गोरक्षा के माहौल में कोई गाय खरीदने को तैयार नहीं, क्या पता उसे घर ले जाते वक़्त रास्ते में कौन सी भीड़ पीट पीट कर मार डाले, आजकल तो सिर्फ संदेह ही काफी है. परिणामस्वरूप गायों के व्यापारिक मूल्य में तो कमी आई ही है, ऐसा प्रचलन में आ चुका है कि बेंचने वाला खरीददार न मिलने पर कई बार अपनी गाय भाग्य भरोसे कहीं छोड़ देता है. लावारिस पशु जहाँ जिसके खेत में चाहे चरता है जिससे उस क्षेत्र के किसान अलग से पीड़ित हो रहे हैं.
प्राकृतिक रूप से गाय बराबर नर एवं मादा बछडों को जन्म देती है. मादा की उपयोगिता दूध के लिए है और हमेशा रहेगी परन्तु नर की उपयोगिता दिन प्रतिदिन मशीनी होती जा रही कृषि में कम होती जा रही है और इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि समय के साथ साथ अधिक से अधिक नर गोवंश मांस के व्यापार की भेंट चढ़ता रहा है. मांस का व्यापार विश्व के किसी भी देश में गोवंश आधारित अर्थव्यवस्था को संतुलन प्रदान करता है और भारत इसका कोई अपवाद नहीं है. जिसे अन्यथा लगता हो वो इस बात का उत्तर दें कि जितनी गायें दिखाई देती हैं उतने बैल क्यों नहीँ. गोरक्षा एक महान कामना है लेकिन वह सिर्फ कह देने से नहीं हो जाएगी, इसकी कामना करने वालोँ को इस बात का समाधान देना होगा कि गोरक्षित समाज में नर बछडों की क्या उपयोगिता होगी.
सच यह है कि वे लोग जो जीविका के लिए पशुओं पर आश्रित हैं गायों की जगह भैसों को प्राथमिकता देना शुरू कर चुके हैं. उन्हें सभ्यता और संस्कृति का कितना ज्ञान और चिंता है यह तो पता नहीं लेकिन अपनी जीविका की चिंता ज़रूर है. वे निश्चय ही इस बात का शुक्रगुज़ार होंगे कि कम से कम भैंसें गोरक्षा आन्दोलन से अछूती हैं, दूध तो देती ही हैं, उनका मांस भी कानूनन निर्यात किया जा सकता है और ट्रक में ले जाया जाता देखकर भीड़ के ह्रदय में सभ्यता और संस्कृति बचाने का जूनून भी पैदा नहीं होता. कम से कम इस समय मैं यह गणना कर सकता हूँ कि या तो इस अव्यावहारिक गोरक्षा आन्दोलन का अंत शीघ्र ही हो जाये अन्यथा इस आन्दोलन की वास्तविक विजेता होगी भैंस, और गाय पाई जाएगी सिर्फ चिड़ियाघर में! गोरक्षक कुछ उस खिलाड़ी जैसे खिसियाए रह जाएँगे जो निकला तो था अपने गोल की रक्षा करने लेकिन उसी में गोल दाग बैठा.


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