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कहाँ ले जा रही गोरक्षा

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आज बहुत समय बाद मैंने पापा से फ़ोन पर बात की. एक साल हो चुके घर गए हुए. हाल चाल के साथ मैंने पूछ लिया इस समय घर पर कितनी गायें है. उन्होंने बताया चार. मैं दो या तीन की उम्मीद कर रहा था तो कौतूहल से पूछा नई आई हैं क्या. उन्होने कहा हाँ एक पास के गांव से खरीदी है और दूसरी लावारिस है, खेत में चर रही थी, नुकसान कर रही थी तो बाँध ली है. लावारिस सुनकर मैं चौंक पड़ा. शहरों में तो मैंने लावारिस गायें देखी हैं लेकिन गावों में ना देखा न इससे पहले सुना, उन्हें तो धन समझा जाता है. फिर और जानने की कोशिश की और जो पता चला काफी संवेदनशील है. ग्रामीण अर्थव्यवस्था में गाय भैंसों का महत्व सभी को मालूम है. पशु दुधारू है तो आय का माध्यम है, दुधारू नहीं तो या तो उसके फिर से दुधारू होने  का इंतज़ार किया जाता है या उसे अपेक्षाकृत कम मूल्य में बेच कर और पैसे लगाकर दुधारू पशु ले आया जाता है. ये दूसरा वाला रास्ता ज्यादातर वो लोग लेते हैं जो बिना दूध देने वाले पशु को खिला पिला नहीं सकते क्यूंकि उसमे पूंजी लगती है. और ऐसे गोपालक अब सीधे तौर पर पीड़ित हैं. देश में भीड़ संचालित गोरक्षा के माहौल में कोई गाय खर...